कर्म अच्छा या बुरा होता है, कर्ता अच्छा या बुरा नहीं होता। जिसे हम अच्छा इन्सान मानते हैं, उससे भी बुरा कर्म होता है। जिसे हम बुरा इन्सान कहते हैं, वह भी अच्छा कर्म कर सकता है। हमारा ध्यान कर्म की अच्छाई-बुराई पर होना चाहिए, कर्ता की अच्छाई-बुराई पर नहीं।कर्म पर ध्यान रहने से तथाकथित अच्छे आदमी को अच्छेपन का अभिमान नहीं होता है और तथाकथित बुरे आदमी को भावी सुधार की आशा रहती है।
राजीव
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