धर्म का मूल पवित्रता-अपवित्रता का विचार नहीं, बल्कि उचित-अनुचित का विचार होना चाहिए । हिन्दू धर्म में पवित्रता-अपवित्रता पर अधिक ज़ोर दिया गया है और इसलिए यह धर्म मुख्य तौर पर देह शुद्धि, आहार शुद्धि, स्पृश्य-अस्पृश्य, शौच-अशौच में सिमटकर रह गया है। देह शुद्धि पर हमारा ध्यान इस तरह केन्द्रित रहा है कि हम चित्त शुद्धि भूल गये। बुद्ध चित्त शुद्धि को धर्म का मूल मानते थे।
राजीव
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