Saturday, June 27, 2015

श्रद्धा


हृदय  की पसंद और नापसंद के अपने कारण होते हैं, जिसका बुद्धि को कोई पता नहीं रहता. हम इसका अनुभव ह्जार बातों में करते हैं. मेरा यह मानना है कि हृदय  सर्वव्यापी सत्ता से  और अपने आप से भी स्वभावतः प्रेम करता है – उस हद तक जिस हद तक वह अपने आप को उनके प्रति समर्पित  करता है. यदि वह ईश्वर से अथवा अपने आप से दूर जाता है तो ऐसा वह जानबूझकर करता है. आपने ईश्वर के लिए हृदय के कपाट बंद कर रखे हैं, लेकिन आत्म प्रेम संजो कर रखा है. क्या आपका आत्म प्रेम बुद्धि से प्रेरित है ?  

हृदय को ही ईश्वर का अनुभव होता है, बुद्धि को नहीं. अतः श्रद्धा का अर्थ है: हृदय में ईश्वर को महसूस करना, बुद्दि या तर्क से नहीं.

 

पास्कल

 

Friday, June 26, 2015

शुभ या प्रिय

शुभ कुछ और है, प्रिय कुछ और है. ये दोनों अलग-अलग प्रयोजन से लोगों को बाँधते हैं. इनमें जो शुभ का चुनाव करते हैं,  उनका  कल्याण होता है . जो प्रिय का वरण करते हैं, वे जीवन के महत् उद्देश्य में  असफल होते हैं.


कठ उपनिषद

ईश्वर और मानव प्रेम

किसी भी चीज को जानने के लिए हमें उसके  करीब जाना पड़ता है .
ईश्वर को जानने के लिए भी आपको उसके करीब जाना पड़ेगा .
ईश्वर के करीब जाना केवल अच्छे कर्मों से ही सम्भव है.
जब आदमी का जीवन अच्छाइयों से  भरने लगता है , तब वह ईश्वर को भी अधिक अच्छी तरह समझने लगता है.
और ईश्वर के  सम्बंध में ज्यों-ज्यों उसकी समझ  विकसित होती  जाती  है उसके मन में हर मानव के प्रति प्रेम बढ़ता जाता है.
ईश्वर का ज्ञान  मानव प्रेम की ओर ले जाता है और मानव प्रेम ईश्वर की ओर ले  जाता है.



लियो टाल्स्टाय