हृदय की पसंद और नापसंद के अपने
कारण होते हैं, जिसका बुद्धि को कोई पता नहीं रहता. हम इसका अनुभव ह्जार बातों में करते
हैं. मेरा यह मानना है कि हृदय सर्वव्यापी
सत्ता से और अपने आप से भी स्वभावतः प्रेम
करता है – उस हद तक जिस हद तक वह अपने आप को उनके प्रति समर्पित करता है. यदि वह ईश्वर से अथवा अपने आप से दूर जाता
है तो ऐसा वह जानबूझकर करता है. आपने ईश्वर के लिए हृदय के कपाट बंद कर रखे हैं, लेकिन आत्म प्रेम संजो
कर रखा है. क्या आपका आत्म प्रेम बुद्धि से प्रेरित है ?
हृदय को ही ईश्वर का अनुभव होता है, बुद्धि को नहीं. अतः श्रद्धा का अर्थ है:
हृदय में ईश्वर को महसूस करना, बुद्दि या तर्क से नहीं.
पास्कल
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