Friday, June 26, 2015

शुभ या प्रिय

शुभ कुछ और है, प्रिय कुछ और है. ये दोनों अलग-अलग प्रयोजन से लोगों को बाँधते हैं. इनमें जो शुभ का चुनाव करते हैं,  उनका  कल्याण होता है . जो प्रिय का वरण करते हैं, वे जीवन के महत् उद्देश्य में  असफल होते हैं.


कठ उपनिषद

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