Saturday, September 19, 2020

धर्म का मूल

 धर्म का मूल पवित्रता-अपवित्रता का विचार नहीं, बल्कि उचित-अनुचित का विचार होना चाहिए । हिन्दू धर्म में पवित्रता-अपवित्रता पर अधिक ज़ोर दिया गया है और इसलिए यह धर्म मुख्य तौर पर देह शुद्धि, आहार शुद्धि, स्पृश्य-अस्पृश्य, शौच-अशौच में सिमटकर रह गया है। देह शुद्धि पर हमारा ध्यान इस तरह केन्द्रित रहा है कि हम चित्त शुद्धि भूल गये। बुद्ध चित्त शुद्धि को धर्म का मूल मानते थे।


राजीव 

Friday, September 11, 2020

कर्म और कर्ता

 कर्म अच्छा या बुरा होता है, कर्ता अच्छा या बुरा नहीं होता। जिसे हम अच्छा इन्सान मानते हैं, उससे भी बुरा कर्म होता है। जिसे हम बुरा इन्सान कहते हैं, वह भी अच्छा कर्म कर सकता है। हमारा ध्यान कर्म की अच्छाई-बुराई पर होना चाहिए, कर्ता की अच्छाई-बुराई पर नहीं।कर्म पर ध्यान रहने से तथाकथित अच्छे आदमी को अच्छेपन का अभिमान नहीं होता है और तथाकथित बुरे आदमी को भावी सुधार की आशा रहती है।


राजीव 

Friday, June 5, 2020

अच्छाई

अच्छाई ही ईश्वर है। जैसे गांधी ने कहा था सत्य ईश्वर है। सत्य क्या है, इसपर बहस हो सकती है। अच्छाई पर भी बहस हो सकती है, फिर भी , हर मानव के मन में कोई न कोई आदर्श होता है, जिसे वह अच्छा मानता है, भले ही वह पूरी तरह उस आदर्श को अपने जीवन में उतार न सके। यह जो अच्छाई की सर्वव्यापी धारणा है, वही ईश्वर है। इस सृष्टि के मूल में वही है और चरम उद्देश्य भी वही है—— इसलिए वह ईश्वर है। हम अपने जीवन में जिस सीमा तक अच्छाई का वरण कर सकते हैं, उसी सीमा तक हमारे जीवन में ईश्वर का आगमन होता है।


राजीव

Saturday, June 27, 2015

श्रद्धा


हृदय  की पसंद और नापसंद के अपने कारण होते हैं, जिसका बुद्धि को कोई पता नहीं रहता. हम इसका अनुभव ह्जार बातों में करते हैं. मेरा यह मानना है कि हृदय  सर्वव्यापी सत्ता से  और अपने आप से भी स्वभावतः प्रेम करता है – उस हद तक जिस हद तक वह अपने आप को उनके प्रति समर्पित  करता है. यदि वह ईश्वर से अथवा अपने आप से दूर जाता है तो ऐसा वह जानबूझकर करता है. आपने ईश्वर के लिए हृदय के कपाट बंद कर रखे हैं, लेकिन आत्म प्रेम संजो कर रखा है. क्या आपका आत्म प्रेम बुद्धि से प्रेरित है ?  

हृदय को ही ईश्वर का अनुभव होता है, बुद्धि को नहीं. अतः श्रद्धा का अर्थ है: हृदय में ईश्वर को महसूस करना, बुद्दि या तर्क से नहीं.

 

पास्कल

 

Friday, June 26, 2015

शुभ या प्रिय

शुभ कुछ और है, प्रिय कुछ और है. ये दोनों अलग-अलग प्रयोजन से लोगों को बाँधते हैं. इनमें जो शुभ का चुनाव करते हैं,  उनका  कल्याण होता है . जो प्रिय का वरण करते हैं, वे जीवन के महत् उद्देश्य में  असफल होते हैं.


कठ उपनिषद

ईश्वर और मानव प्रेम

किसी भी चीज को जानने के लिए हमें उसके  करीब जाना पड़ता है .
ईश्वर को जानने के लिए भी आपको उसके करीब जाना पड़ेगा .
ईश्वर के करीब जाना केवल अच्छे कर्मों से ही सम्भव है.
जब आदमी का जीवन अच्छाइयों से  भरने लगता है , तब वह ईश्वर को भी अधिक अच्छी तरह समझने लगता है.
और ईश्वर के  सम्बंध में ज्यों-ज्यों उसकी समझ  विकसित होती  जाती  है उसके मन में हर मानव के प्रति प्रेम बढ़ता जाता है.
ईश्वर का ज्ञान  मानव प्रेम की ओर ले जाता है और मानव प्रेम ईश्वर की ओर ले  जाता है.



लियो टाल्स्टाय